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इश्क और अश्क - 88

by Aradhana

वोआसमान में कनिष्क उड़ रहा था।प्राणली उसकी पकड़ में थी।नीचे जंगल था। पेड़ थे। अँधेरा था।प्राणली छटपटा रही थी।पर ...

इश्क और अश्क - 87

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तलवार हवा में थी।सब कुछ एक पल में हुआ।परास ने देखा और चिल्लाया :"वर्धान—!"पर वर्धान मुड़ा नहीं।वो मुड़ नहीं ...

इश्क और अश्क - 86

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उसे अपने सीने से लगा लिया।प्राणली ने पहले हिचकिचाया।एक पल के लिए।बस एक पल।और फिर —वो टूट गई।उसने उसकी ...

इश्क और अश्क - 85

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धागा टूटा।और उसी पल —कनिष्क हँसा।इतने ज़ोर से।इतनी खुशी से।जैसे सालों से कोई चीज़ चाहता था — और आज ...

इश्क और अश्क - 84

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शहनाई अभी भी बज रही थी।किसी को ख़बर नहीं थी कि रोकें।बाहर ढोल था। हँसी थी। फूल थे।लगता है ...

इश्क और अश्क - 83

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मंत्रों की आवाज़ महल में गूँज रही थी।धीमी। गहरी।हर शब्द जैसे हवा में घुल रहा हो — पर प्रणाली ...

इश्क और अश्क - 82

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दूल्हे राजा... बहुत जच रहे हो।”अविराज ने पलटकर देखा।कनिष्क।दरवाज़े पर टिका हुआ… बाँहें सीने पर…चेहरे पर वही मुस्कान — ...

इश्क और अश्क - 81

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वर्धान ने द्वार पर दस्तक दी।"आइए।"शोभित खिड़की के पास खड़े थे। सुबह की पहली रोशनी उनके सफ़ेद पंखों पर ...

इश्क और अश्क - 80

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तलवार अभी भी वर्धान की गर्दन पर थी।पारस की आँखें — गुस्से से भरी।वर्धान ने हिलने की कोशिश नहीं ...

इश्क और अश्क - 79

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पारस चुपचाप बैठा रहा।प्रणाली के रोने की आवाज़ धीरे धीरे शांत हो रही थी।कितनी देर बाद —उसने अपना सिर ...