अगले कुछ दिनों तक महक ने खुद को रोज़मर्रा के कामों में उलझाए रखा।पर जितनी कोशिश करती, उतनी ही ...
14 नवंबर की सुबह थी।घर में रौनक थी... चहल-पहल थी... और एक खास चमक — जैसे सच में लक्ष्मी ...
नियति का मोड़शहनाइयाँ बज रही थीं।मंडप में अग्नि जल रही थी।फूलों की खुशबू और हवन की धूप के बीच, ...
नवंबर की हल्की ठंड...और मीठी-सी धूप में...आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही ...